आम ,लीची ,कटहल और स्वाद विमर्श


आम को लेकर तरह तरह की लालसाएं सामने आ रही हैं।  मतदाता प्रजाति के आम पहले से चर्चा में थे । अभी चुनाव दूर हैं तो आम टाइप के वोटर अपनी -अपनी कोटर में हैं । लेकिन  पेड़ पर लगने और समय -असमय  टपक पड़ने वाले आम  यकायक बड़े खास हो चले  हैं । और हों भी क्यों न ,आखिर वो लगे जो हैं सरकारी डाल पर । उनकी रखवाल के लिए बाकायदा सशस्त्र पुलिस बल तैनात किया  गया  है । एक -एक आम की सुरक्षा पूरी मुस्तैदी से की जा रही है।  चप्पे चप्पे पर गुप्तचर आँख गडायें हैं ताकि  कोई ऐरागैरा उन्हें  चखने न  पाए । यह यकीनन  आम की सोहबत का प्रताप है कि  आम तो आम उनके सान्निध्य में लगी लीचियां तक खास बन गई है । अब तक माली बगीचों में लगने वाले रसीले आमों  का लालची परिंदों से बचाव बाग में टिन के कनस्तर बजा कर , मुख से हुर्र हुर्र की आवाज़ पैदा करके और गुलेल से कुछ ढेले इधर उधर दाग कर किया करते थे ।यह उस समय की बात है जब आम सिर्फ आम होते थे ।मीठे गूदे से भरे रसीले आम ,जिसका रसास्वादन समाज के सभी तबके के लोग खांटी समतावादी अवधारणा के अनुरूप करते थे । यह अलग बात है कि तब भी आम के मामले में हर कोई अपनी  खास समझ और परख रखता था ।
आम एकबार फिर चर्चा के केन्द्र में है लेकिन इस बार मामला विशुद्ध  राजनीतिक  होने की वजह से जरा पेचीदा बन गया है ।दो दिग्गजों के लिए यह जिह्वा की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है ।उन्होंने अपनी जबान को मेरठ की तेजतर्रार कतरनी बना लिया है।  शायद ऐसा पहली बार हो रहा है कि  व्यक्तिगत और जातिगत सम्मान से जुड़े किसी मामले में से नाक पूर्णत: नदारद है । अलबत्ता स्वाद को लेकर देशभर में  विमर्श हो रहा है और इस पर  चटखारे भी लिए जा रहे हैं । वैसे भी अलग अलग प्रसंग में  नाकें इतनी बार कट चुकी हैं कि अब वे  किसी मसले में अड़ने लायक रही भी नहीं । नाक की साख जड़मूल से समाप्त हो चुकी है ,लेकिन जीभ है कि उसका  तिलिस्म अभी बदस्तूर कायम है।  
पता चला है कि आम लीची के साथ ही साथ कटहल को भी वीआईपी सुरक्षा घेरे में ले लिया  गया है। इससे कटहल के सोशल स्टेट्स में  चार चाँद टंक  गए हैं और जनता के बीच यह ‘लाउड और क्लीयर’  मैसेज चला गया है कि सत्ताधारी चाहे जो हो , उनकी संवेदनशीलता ,कार्यप्रणाली और हनक लगभग एक जैसी और अमूमन बड़े कमाल की होती है । वह फल और सब्जी में गुणवत्ता को लेकर कोई ज्यादा भेद नहीं करते। पर वह किसी को कुछ भी आसानी से  मिलने भी नहीं देते। किसी को जब कुछ प्रदान करते हैं तो राजनीतिक नफा –नुकसान  की तराजू पर तोल जरूर लेते हैं। दाता होने की दैवीय आभा से ओतप्रोत होकर देते हैं। बेवजह तो यह लोग उबासी भी नहीं लेते ।      
सरकारी  पेड़ पौधों  पर पनपने वाले फल हों या सब्जी  ,उनकी तो हर बात निराली होती है ।इनका स्वाद चखने  के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं ।’आम के आम गुठलियों के दाम’ के गूढ़ निहितार्थ को ठीक से समझना पड़ता है । इन्हें कोई यूँही अनाधिकृत तरीके से खा पचा नहीं सकता। सरकारी सुविधायें  चाहे जिस श्रेणी की हो ,वह कभी अनायास नहीं मिलती। इसे पाने के लिए सहज रास्ते कभी उपलब्ध नहीं रहते।इन्हें पाने के लिए बड़ी जोड़ जुगाड़ करनी ही होती है ।      
लीची हो ,कटहल हो  या फिर आम जब राजकीय सरपरस्ती  पा जाते हैं तब एकदम खास बन जाते हैं । खास बोले तो एकदम झक्कास ।   




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