अबकी बार हंसोड़ सरकार


बिहार में चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है । विवाह के अवसर पर होने वाले सामूहिक भोज का सा माहौल बनने लगा है । हलवाईयों ने अपनी भट्टियां लीपनी शुरू कर दी है । आटा दाल चीनी आलू नमक आदि की पहली खेप समारोह स्थल पर पहुंचने लगी है । मंगल गीत गाने के लिए गवैये अपना गला खंखार रहे हैं । ढोलकों की धमक को ठोक पीट कर दुरुस्त किया जा रहा है । समय रहते तमाम इंतजामों को परखने की कवायद चल रही है । दूल्हा  कौन होगा ,इसका ऐलान भी हो गया  है । मन मसोस कर सब गोलबंद हो गए हैं।  प्रदेश का वोटर दम साधे सारा कौतुक देख रहा है । आसन्न चुनावों को भांप कर दुधारू पशु समय असमय रंभाने लगे हैं। वे भी वक्त आने पर सत्ता में अपने लिए उचित भागीदारी की मांग कर सकते  हैं ।
सुशासन बाबू लगातार मुस्कुरा रहे हैं । कोई बता रहा है कि वह मुस्कुरा नहीं रहे वास्तव में इतरा रहे हैं ।पहले वह आधे अधूरे धार्मिक टाइप के थे या कहें टू –इन –वन । जैसा मौका हुआ वैसे हो लिए। लेकिन  जब से वह शतप्रतिशत ‘सेकुलर’ हुए हैं तब से वह बेहद खुशमिजाज हो चले हैं । उनकी होठों पर मुस्कुराहट स्थाई रूप से चिपक गई है। उन्होंने हँसते हँसते ऐलान कर दिया है कि वह प्रदेश के विकास की खातिर  कुछ भी कर सकते हैं। विकास से उनका आशय अपने सत्तारूढ़ होने से है । सर्वांगीण तरक्की के लिए वह भूतपूर्व जी को नाना  प्रकार की सुविधाएँ और तमाम प्रजाति के फल और कटहल न्योछावर करने को तैयार हैं बशर्ते वह सत्ता में भागीदारी की  मांग न करें ।
पर भूतपूर्व जी हैं कि वह मान कर भी मानते ही नहीं । बार- बार किसी न किसी बात पर बिदक और रूठ जाते हैं । जब वह नाराज़ होते हैं तो कह देते हैं कि उन्होंने तमाम विकल्प खुले रखे हैं । इसी खुलेपन की खातिर वह विभिन्न दलों के नेताओं से क्लोज डोर मीटिंग कर आते हैं । उन्हें पता है कि राजनीति के बाज़ार में दरवाजे सदा खुले रखने चाहिए । सिर्फ दरवाजे ही नहीं खिड़कियाँ और रौशनदान भी चौपट खुले रहें तो उम्मीद की गगरी कभी नहीं रीतती ।  ब्याह बारातों की दावतों में लड्डू उसी की पत्तलों में प्रकट होते हैं जो उसमें उन्हें परसे जाने की गुंजाइश रखते हैं । जिन पत्तलों में रायता सब्जी चटनी चारों ओर फैली होती है ,उसमें लड्डू परसने  वाले हाथ ठिठक  जाते हैं ।
सुशासन बाबू अपने को राजनीति की रमी का तुरुप का इक्का मान रहे हैं। उनके विरोधी अलबत्ता उन्हें कुछ और ही समझ रहे हैं। ताश के खेल में तुरप और जोकर की एक जैसा महत्व और उपयोगिता होती है।
पंगत अभी ठीक से बिछी नहीं है लेकिन शादी ब्याह जैसे मांगलिक अवसरों पर नाराज़ और कुपित होने वाले लोग कमर कस का तैयार हो गए हैं। सुशासन जी को यकीन है कि गठबंधन द्वय  की चुहलबाजी और उलटबांसी के जरिये अन्तोतगत्वा वह जनता को रिझा लेने में कामयाब हो जायेंगे । उन्होंने अपने गठबन्धन के लिए पंच लाइन तय की है – भाई बिरादर सब हैं साथ  , कुशासन को दे दो मात । अबकी बार हंसोड़ सरकार। 




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