जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग


अढाई हज़ार साल से हम जलीकट्टू खेलते हुए मरखने बैलों को साध रहे हैं।सैकड़ों बरसों से हम एक दूसरे के कंधे पर पाँव रख कर दही की हांडी चकनाचूर कर रहे हैं।गत अनेक दशकों से हम अपने बच्चों को भविष्य के लिए प्रशिक्षित करने के नाम पर तोते जैसी रटंत विद्या में प्रवीण बना रहे हैं।वर्तमान में हम अतीत के चोटिल परन्तु महिमामंडित संस्कृति में संतति के लिए गोलमटोल ‘पे पैकेज’ टटोल रहे हैं।बदलते वक्त के साथ हम खुद को लेशमात्र बदलने को तैयार नहीं।गंदगी से बजबजाती नालियों को हम इसलिए साफ़ करने को तैयार नहीं क्योंकि स्वच्छता से हमारी युगीन असहमति रही है।जीवन मूल्य तेजी से उल्ट पलट हो रहे हैं लेकिन हम अपनी परम्पराओं के वैभव के समर्थन में डटे हैं।हमारे सिरों पर नुकीले सींग उग आये हैं।
बैल के सींग पर लटके सोने चांदी के सिक्के पाने या लूटने पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लूटपाट ही हमारी महत्वकांक्षा है।आकाश में लटकी हांडियों को फोड़ कर उसमें रखे द्रव्य को पाने की वीरता सर्वकालिक है। लेकिन इसमें जोखिम है।सबको पता है कि नो रिस्क ,नो गेम।जिस काम में रिस्क फैक्टर न हो वह तो घर की चौखट पर बैठकर लडकियों द्वारा खेले जाने वाले गिट्टू का खेल है।बेहद निरापद।अतिशय मासूम।एकदम घरेलू।निहायत स्त्रैण।
एक समय था जब लड़के गली मोहल्ले में गुल्ली डंडा खेलते थे ।लडकियाँ घर आंगन में इक्क्ल दुक्कल खेलती थीं।लड़के उद्दंड होते हैं।तब भी होते होंगे।खेल ही खेल में झगड़ पड़ते।परस्पर मारपीट कर बैठते।लडकियाँ सहेलियों से किसी बात पर नाराज होती हैं,तो रूठ जाती।मुंह फुला लेती।अबोला कर लेती।ऐसा करते करते कब ये खेल समय बाहर हुए,पता ही नहीं लगा।न कोई सवाल उठा।न किसी ने इन खेलों के खत्म होने को लेकर गुस्सा जताया।
जलीकट्टू पर लगे बैन को लेकर सांस्कृतिक विरासत के हलवाहे ऐसे बैचैन थे जैसे उनके खूंटे से बंधी भैंस कोई जबरन हांक ले गया हो.यह न रहा तो उनके ऐतिहासिक साहस का क्या बनेगा।
कोई भी न्याय पद्धति बैल या दही हांडी से बड़ी कैसे हो सकती है? 

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