तुला में फुदकता मतवाद


अमुक जी आजकल कहाँ हैं?यह एक ऐसा सवाल है जो समय समय पर किसी न किसी बहाने उठता या उठाया जाता रहा है।
वास्तव में यह अमुक जी और कुछ नहीं रिक्त स्थान पर लगे डाॅट है। रिक्त स्थान पूर्ति के लिए छोड़ दी गयी खाली जगह।एसएमएस की शैली में कहा और समझा जाए तो स्पेस।जब हम खुद को समझने में निर्णायक रूप से पराजित हो जाते हैं तब दूसरों की जिन्दगी का अतापता पूछना शुरू करते हैं।यह पूछताछ ऐसी ही है जैसे कोई नकटा दूसरों की नाक की कुशलक्षेम जानने के बहाने कुतरी हुई नाक के विषय में जानकर तसल्ली पाए।
 अमुक जी के बारे में जानना इतना सरल भी नहीं होता पर खोज पड़ताल की जाए तो उनका पता लगा लेना इतना कठिन भी नहीं ।मैंने फोटो फ्रेम करने वाले मुसद्दी लाल जी से दरयाफ्त की तो उन्होंने बताया कि वह अभी दो चार दिन पहले लोहिया जी की तस्वीर मढ़वाते हुए दुकान पर बरामद हुए थे।इससे पहले बाबा जी का लेमिनेट किया चित्र ले गये थे।इसके बाद उस भगवाधारी बाबाजी को कोट पेंट वाले बाबा साहब से बदल कर ले गये थे।एक दिन अन्ना का आदमकद चित्र ढूंढते हुए आये थे जब वह उन्हें नहीं मिला तो बन्दर नचाते मदारी का फोटो यह कह कर ले गये कि यह भी ठीक है।इससे भी काम चल जायेगा।बोसीदा दीवार को ढांपना  ही तो है।
मैंने आपसे पहले ही कहा कि अमुक जी किसी का वास्तविक नाम नहीं है।वह तो नामचार के लिए बचा कर रखी गयी जगह है केवल।यह  जगह तभी भरती है जब सुपात्र  मिल जाता है। इसे भरने के लिए नाम उठाने,उछालने और धरने होते हैं।उपयुक्त नामधारी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।कठिनाई से इसलिए मिलते हैं क्योंकि वे उसी तरह हिलते डुलते रहते हैं जैसे मेंढक लाख कोशिश के बाद भी कहाँ तुलते हैं।जब तक तुला की डंडी थामो एक पलड़े से दूसरे में फुदक जाते हैं।बनते –बनते संतुलन में दोलन कर जाते हैं।न..न....दलबदल नहीं करते।सिर्फ अपनी धारणाओं में विकास करते हैं।कारोबारी शब्दावली में कहें तो अपने मतवाद में वैल्यू एडिशन करते जाते हैं।दरअसल यह मूल्य सम्वर्धन बड़े कमाल की चीज है।
अमुक जी बड़े दिलवाले होते हैं।इनका दिल हमिंग बर्ड की तरह लगातार उड़ता रहता है।किसी एक डाल पर देर तक नहीं टिकता।एक फूल पर रसपान के लिए चिपकता नहीं ,निरंतर फुर्र फुर्र उड़ान भरता है।ये लगभग भारहीन होते हैं।किसी भी तरह का आकर्षण इनके लिए अपकर्षण होता है।गुरुत्वाकर्षण को धता बताना इन्हें आता है।
चुनाव का मौसम इनके लिए मुरादों से भरे दिनों का समुच्चय होता है।इनके घर दफ्तर की खाली दीवारें इनके भरेपन का कूट संकेत है।इनकी राजनीतिक समझ की निशानदेही भी।जब ये कहीं नहीं दिखते तो वे हर जगह होते हैं।ये न कभी दल बदलते हैं और न ऐसी किसी बात को दिल पर लेने की नादानी करते हैं।दिल को धड़कने के लिए सदा खुला रखते हैं।गाहे बगाहे दल जरूर बदल लेते हैं लेकिन दिल को इस मामले को अपने आसपास भी नहीं फटकने देते।

अमुक जी रिक्त स्थान तो हैं लेकिन ऐसी उन्मुक्त लावारिस स्पेस  भी नहीं कि उस पर जाकर जो चाहे अपना मालिकाना हक या मंतव्य यूँही खाली –पीली टांग आये।

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