वाचिक परम्परा के विप्लव पुरुष का आगमन


मुल्क को एक नया नकोर आइकन मिला।बोरियत में आकंठ डूबे राजनीतिक विमर्श को नवजात मुहावरा मिल गया है।चर्चा के चरखे को  ऊदी हुई कपास मिली।विधान सभाओं के आसन्न चुनावों के लिए दमदार मुद्दा मिला है।इतिहास के पन्नों में दर्ज़ होने लायक नायक अवतरित हुआ है।आज़ादी लफ्ज़ को अभिनव व्याख्याकार प्राप्त हुआ।प्रेरणादायक बलिदानियों का रेप्लिका उपलब्ध हुआ।मुबारक हो,बड़े दिनों के बाद वर्तमान के सुनसान आंगन में भविष्य में होने वाली क्रांति की संभावना की बिगुलनुमा किलकारी गूंजी।
सबको पता लगा कि सम्प्रभुता सम्पन्न मुल्क को अभी और अधिक आज़ादी की जरूरत है।उसे मुक्ति चाहिए मोटी बंद किताबों से।उसे निजात पाना है कृशकाय किन्तु चौपट खुले ऐतिहासिक संदर्भों से।उसे खुद को पृथक करना है अपने भूगोल से।क्रांति की हर ज्ञात अवधारणा से विरत होकर विप्लव की खिचड़ी के लिए नई रेसिपी इज़ाद करनी है।मुंगेरी लाल के हसीन सपनों को अमली जामा पहनाना है।वाचिक परम्परा के विप्लव पुरुष का आगमन यकीनन आह्लादकारी है।
समय –समय पर करिश्माई अवतार धरा के भ्रमण पर आते  रहते हैं।ये बड़े नाटकीय अंदाज़ में आते हैं।आते ही हवा में बंद मुट्ठियाँ उछालते हैं।पंजों के बल उचक कर अपने आदमकद होने की घोषणा करते हैं।अपने भक्तों से कहते हैं कि वे पुरातनपंथी भक्तगणों के खिलाफ़ सवाल उठा रहे हैं।इसके बाद वे अपने जादुई हैट में से सरोकारों का  खरगोश फुदकते हुए दिखाते हैं।कभी-कभी खरगोश की जगह सफ़ेद कबूतर हवा में उड़ा देते हैं।मौके की नज़ाकत को भांप कब किसे फुदकाना या उड़ाना है,त,भलीभांति जानते हैं।
मिथकीय गाथाएं गवाह है कि असाधारण प्रतिभाएं कभी मेटरनिटी होम में सामान्य परिस्थिति में  और तयशुदा रीति से जन्म नहीं लिया करतीं।ये कभी जरथुस्त की तरह हंसते गाते पैदा होती हैं तो कभी किसी बुद्धपुरुष की तरह जन्मते ही पांच कदम चलती हैं।
आजकल जो आइकन जन्म लेते हैं वे तुरत फुरत सोशल मीडिया पर चस्पा हो जाते हैं।ट्विटर पर ट्रेंड बनकर चहुँओर इतराते हैं।इनके मंतव्य बड़े हाईफाई टाइप के वाईफाई होते हैं।
ख़ुशामदीद विप्लव!तुम्हारे द्वारा आने वाले समय में पकाई जाने वाली खिचड़ी का गरीबी रेखा के नीचे चहलकदमी कर रही मुल्क की अधिसंख्य कुपोषित जनता को बड़ी बेसब्री से इंतजार है।









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