सरकार,सरोकार और लग्जरी टेक्स


बिहार सरकार ने समोसा,जलेबी,नमकीन और मच्छर भगाने वाली टिकिया समेत कई चीजों पर "लग्जरी टैक्स" लगा दिया है। सरकार ने जनता को स्पष्ट सन्देश दे दिया है कि वह विलासिता के खिलाफ है। वह वही ऐयाशी बर्दाश्त करेगी जिस पर उसे  टेक्स मिलेगा। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि लग्जरी चाहिए तो जेब ढीली करो। ऐशोआराम केवल उन्हीं के लिए है ,जिनकी बाजुओं में दम या जेब में भरपूर दाम हैं।
मच्छर भगाना विषय भोग है।मच्छर से खुद को कटवाना हठयोग है।निरंतर कष्टों से जूझते रहना यथार्थ बोध है। डेंगू या मलेरिया यद्यपि रोग है लेकिन इससे निज़ात दिलवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग मुस्तैद है।मच्छरों का बना रहना विभाग की कार्यकुशलता के लिए जरूरी है। इससे ही सरकार के तत्कालिक सरोकारों का पता लगता है।
बेसिकली सरकारें  सुखवाद के खिलाफ़ होती हैं।उन्हें  पता है कि सुखद वातावरण में कर्मठता का क्षय होता है।मच्छर रहित माहौल में रहता आदमी दिन चढ़े तक सोता है।जागता है तो इस तरह अंगडाई लेता है मानो वह जागृत होकर धरती पर कोई अहसान कर रहा हो।सुबह की पहली चाय सुडकते हुए अखबार की खबरों को चाट चाट कर पढ़ता है। प्रत्येक खबरी चटखारे के साथ कहता चलता है कि जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है। भले ही वह घर में लगा फ्यूज़ बल्ब न बदल पाता हो पर सरकार बदलने की रट लगाता है। आरामतलब आदमी और कुछ कर पाए या न कर पाए, क्रांति का बिगुल बहुत बजाता है।
समोसा आमतौर से तिकोना होता है।उसके भीतर आलू मटर और मसाला होता है।वह गर्म तेल में देर तक तलने से पकता है। इसे खाने के लिए लाल हरी पीली चटनी की जरूरत होती है।जो व्यंजन इतनी तामझाम के बाद बने और खाया जाए ,उसे तो लग्जरी की श्रेणी में रखना ही होगा।
जलेबी गोल गोल होती है। गोल होती नहीं उसे घुमघुमाकर वृताकार रूप दिया जाता है। छुन्न छुन्न कर उसे तलने के बाद चीनी के उस मिनी पूल में डाला जाता है,जिसमें पहले से मधु मक्खी और चींटे स्वीमिंग कर रहे होते हैं। इतनी जद्दोजेहद के बाद जो व्यंजन तैयार होता हो,उसे साधारण की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है। ।
नमकीन तो हमेशा से राजसी वस्तु रहा है। दारु चाहे जिस क्वालिटी की हो ,उसके साथ नमक की सुस्वादु गमक हमेशा मौजूद रहती  है।सरकार लग्जरी के तो खिलाफ़ नहीं लेकिन खाली-पीली विलासिता के खिलाफ़ है।इति सिद्धम।

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