बदलता मौसम और बम्पर सेल

सर्दी लगभग जा चुकी है।वसंत ठीक से आया नहीं है।या शायद आ भी गया हो लेकिन उसका जिक्र कोई नहीं कर रहा।तोते पिंजरे का दरवाज़ा खुला होने के बावजूद मजे से हरी मिर्च कुतरते हुए ‘आज़ादी आज़ादी’ की रट लगाये हैं।इस समय पूरा देश तरह–तरह के सवालों के घेरे में है।जिसे देखो उसी की जेब में प्रश्नों की पुड़िया है।भक्त टाइप लोगों के पास मुल्क की  अस्मिता और  देशभक्ति का मुद्दा है।उनके हाथों में लाठियों पर टंगे झण्डे हैं।जुबान पर तेजाबी बयान हैं।चेहरे पर कर्तव्यपरायणता की  दमक  है। वे हर सोच और मंशा पर सवालिया निशान लगाने वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटने का जबरदस्त कौशल दिखा रहे हैं।पिटने वालों लिए यह  त्रासदी का महानायक बनने का सही समय है।
मौसम बदलने के साथ गर्म ऊनी कपड़े घटी दरों पर ‘बम्पर सेल’ पर बिकने के लिए शोकेस के हैंगर पर टंग गये हैं।गर्मी में पहनने लायक सूती झीने कपड़े अभी अलमारियों में तह लगे रखे हैं।राजनीतिक माहौल गरमा गया है,पर इतना भी नहीं गर्म हुआ है कि माथे पर पसीना चुहचुहा आये।देह पसीने के नमक से इतनी नमकीन नहीं हुई है  कि अपनी-अपनी आइडियोलाजी के अनुसार नमक हलाली के सवाल उठने लगें।वैसे भी राजनीति में नमकहलाली और नमकहरामी में कोई मौलिक भेद नहीं होता।यह बदलते हुए मौसम का संगीन समय है। ऐसे में एहतियात ही बचाव है।वस्तुत: यह भविष्य की सर्द ऋतु के लिए कम खर्च पर बेहतरीन ब्रांडेड डिजाइनर्स गर्म कपड़ों की खरीददारी की अक्लमंदी दिखाने का मौका  है।यह आने वाले कल के सपनों में निवेश की रुत है।
पूरे मुल्क में भागमभाग और धरपकड़ मची है।मीडिया की मंडी में बड़ी हलचल है।सब अपने - अपने चैनल के लिए टीआरपी बटोरने के लिए पारदर्शी जाल बिछाए बैठे हैं।सबको पता है कि आजकल सूचना प्रधान ‘सीजन’ चल रहा है। वीडियो क्लिपिंग के ज़रिये मनमाफिक सच और झूठ सामने आ रहे हैं।यह ठीक उसी तरह का सीजन है जैसे डेंगू जैसी महामारी फैलने पर डाक्टरों और दवा विक्रेताओं का बन  आती  है।जैसे गर्मी की आहट पाते ही मच्छरों की भिन्न-भिन्न शुरू हो जाती है।जैसे मिठाई भरे थाल के ऊपर रखी चादर के जरा-सा उघड़ते ही मक्खियाँ भिनभिना उठती हैं।जैसे मनमाफिक थानेदार के तैनात होते ही इलाके के सटोरियों की मौज आ जाती है।यकीनन तमाम तरह के स्वप्नजीवियों के लिए यह गुनगुने और  मुरादों भरे दिन  हैं।
बदलती फिज़ा के हिसाब से बाज़ार करवट लेता है।विजय ध्वजा की तरह सेल, महासेल और मेगा  सेल के पट लहराने लगते हैं।राजनीतिक सरोकारों के अनुसार बदलाव और क्रांति की नवीनतम अवधारणायें प्रकट होती है। वातावरण इंस्टेंट कॉफ़ी के झाग और अजब उमंग से भर जाता है। क्रांतिधर्मी पोस्टर योद्धाओं के होठों और मूंछों से चिपक कर यही झाग नवजागरण के गीत गुनगुनाता है।राजनीति के हाट पर इन रणबांकुरों की डिमांड बढ़ जाती है।मुल्क के भीतर कुछ चटखता है तो लोग नई सोच के नये नेता के स्वागत में पलक पांवड़े बिछा देता है।नये रैपर में नये समीकरण सामने आते हैं। सोच भी मौसमी होती है, बदलते वक्त के साथ बदल जाती है।
होली जब आएगी तब आएगी।बजट सत्र से पहले ही इस पर्व के साथ जुड़ा हुडदंग सामने आ गया है।एक दूसरे के मुंह पर कालिख पोतने की होड़ लगी है।जगह-जगह मजीरे बज रहे हैं।सब अपने –अपने एजेंडे का  फाग गा रहे हैं।इसमें वादन का ‘पिच’ इतना अधिक है कि इसकी धमक में असल मंतव्य हवा में गुम हो गये हैं।देशद्रोह और देशभक्ति के नारों  का अबीर चारों तरफ बिखरा है।







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